ये गुनाह तो नहीं ?

पिछले दस साल से मैं पत्रकारिता मैं हूं और कुछ साल पहले तक कभी मुझे इस सवाल ने परेशान नहीं किया कि मैं क्राइम कवर करता हूं ,क्राइम का प्रोग्राम बनाता हूं। लेकिन पिछले कुछ साल से ये सवाल लगातार मुझे मथ रहा है। बार बार ये सवाल मुझे विचलित करता है कि क्या क्राइम पत्रकारिता गुनाह है? लोगों को गुनाहगारों से होशियार करना गुनाह है?

वैसे ये वो सवाल है जिसका जवाब देना जितना आसान दिखता है, दरअसल वो उतना ही मुशकिल है। हमारी इंडस्ट्री के कुछ पत्रकारों का मत है कि पत्रकारिता में क्राइम प्रोग्राम नहीं होना चाहिए। कुछ बुद्दिजीवी भी इसी राय के हैं कि किसी भी न्यूज़ चैनल को अपराध क्रार्यक्रम नहीं दिखाना चाहिए। इसके समर्थन में वो विभिन्न तर्क देते हैं।

कभी कहा जाता है क्राइम प्रोग्राम को मिर्च मसाला लगाकर दिखाया जाता है तो कभी कहा है जाता है कि ऐसे प्रोग्राम को परिवार के साथ बैठकर देखना मुमकिन नहीं। तर्क और भी दिए जाते हैं और इतने हैं कि न तो तर्क खत्म होंगे और न ही बहस।

बहरहाल, वापस मुद्दे पर लौटते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं क्राइम प्रोग्राम बनाता हूं बल्कि एक दर्शक और एक आम आदमी के तौर पर भी मेरा ये मानना है कि न्यूज़ चैनल्स में क्राइम प्रोग्राम होना चाहिए।

अपनी बात के समर्थन में मैं हर उस पत्रकार, बुद्दिजीवी और से ये सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या क्राइम प्रोग्राम से समाज को कोई नुक्सान हुआ है? सिर्फ हवाई बातें न करके ,क्या अपनी बात के समर्थन में वो कोई पुख्ता प्रमाण दे सकते हैं? हालांकि मेरे पास उपलब्धियों की लंबी लिस्ट है जो ये साबित करती है कि क्राइम प्रोग्राम्स ने समाज को कुछ दिया ही है ,उससे कभी लिया कुछ नहीं ,मसलन पाखंडी तांत्रिकों का पर्दाफाश किसी और ने नहीं, क्राइम के ही एक प्रोग्राम सनसनी ने किया।

रिश्वतखोर पुलिसवालों को कैमरे पर किसी बुद्दिजीवी ने नहीं, बल्कि क्रिमिनल और वारदात ने कैद किया। सेक्स बीमारी के इलाज के नाम पर आम आदमी को लूटने वाले फर्जी सेक्स डॉक्टर्स का असली चेहरा भी क्रिमिनल ने ही जनता के सामने रखा।

लिस्ट बहुत लंबी है और ये तमाम वो मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर आम आदमी से जुडे हैं। इसलिए चाहे बुद्दिजीवी या कुछ पत्रकार कुछ भी कहें, जनता ने तो इन्हें पसंद ही किया और अब भी पसंद करती है।

आरोप ये भी लगते हैं कि क्राइम प्रोग्राम ,पूरे परिवार के साथ बैठकर देखना मुमकिन नहीं, तो मैं कहता हूं कि ऐसे तमाम प्रोग्राम इसीलिए देर रात दिखाए जाते हैं ताकि इन्हें देखकर बडे -बुजुर्ग क्रिमिनल से होशियार रहें।

क्राइम प्रोग्राम को पूरे परिवार के साथ बैठकर देखना कतई मुश्किल नहीं है ,हालांकि उनका मकसद बच्चों को प्रोग्राम दिखाना कतई नहीं है। कहा ये भी जाता है कि क्राइम प्रोग्राम मिर्च -मसाला लगाकर दिखाए जाते हैं।

बिल्कुल ठीक है लेकिन यहां सवाल ये कि क्या हम अपना भोजन बगैर मिर्च मसाले के कर सकता है। किसी भी क्राइम प्रोग्राम में उतना ही मसाला परोसा जाता है जितने की जरुरत होती है।

किसी भी विषय पर अपनी राय थोपने से पहले हम ये क्यों मान लेते हैं कि दर्शक बेवकूफ है दर्शक बेहद समझदार है और सबसे बड़ी बात ,उसके हाथ में हम सबकी सबसे कमजोर नस होती है।

उसके हाथ में रिमोट होता है और अगर कोई भी उसे बेवकूफ समझने की गलती करता है तो ये सिर्फ उसका मानसिक दिवालियापन है और कुछ नहीं । हो सकता है हमसे इक्का दुक्का गलतियां हुई हों,जाहिर है जब आप 24 घंटे के न्यूज़ चैनल में काम करते हैं तो गलतियां होना लाजिमी है लेकिन, उन गलतियों से हमने सीखा है।

ऐसा कभी नहीं हुआ कि अगर इक्का दुक्का गलतियां हुई भी हों तो वो दुहराई गई हों। वैसे सबसे हैरानी वाली बात तो ये है कि किसी भी आम आदमी ने आजतक ऐसा नहीं कहा कि क्राइम प्रोग्राम बंद कर देना चाहिए।

आम आदमी न सिर्फ क्राइम प्रोग्राम देखता है बल्कि ऐसे प्रोग्राम उसे गुनाह के हर हथकंडे से सावधान भी करते हैं।

कहने को अभी बहुत कुछ है लेकिन सबसे आखिर में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा अगर क्राइम प्रोग्राम बंद करने की बात उठती है तो मनोरंजन चैनल्स को तो बंद ही कर देना चाहिए ,क्योंकि वहां जो दिखाया जाता है, विवाद उसपर भी कम नहीं होता। शायद ये बात बताने की जरूरत नहीं कि मनोरंजन चैनल्स की रेटिंग के सामने न्यूज़ चैनल कहीं नहीं ठहरते।

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