ये आदमी है कि अकादमी?

हिंदी में दो प्रकार के लेखक पाए जाते हैं। एक वे, जो ‘आदमी’ कहलाते हैं और दूसरे वे, जो ‘अकादमी’ कहलाने लगते हैं। एक बार जो ‘अकादमी’ हो गया, वह न घर का रहता है और न घाट का। अकादमी होते ही वह धरती से ‘डेढ़ इंच ऊपर’ उड़ने लगता है। साहित्य उसे ऐसे एयरपोर्ट की तरह लगने लगता है, जिससे कहीं भी उड़ा जा सकता है। उसे हर आदमी एक प्रकाशक नजर आता है और दी गई ‘बधाई’ ‘रॉयल्टी’ की तरह सुनाई पड़ती है। वह टीवी की खबरों में संजय दत्त की जगह खुद को देखने लगता है। अखबार में शैंपू बेचती कटरीना कैफ की जगह वह अपनी तस्वीर चिपका लेता है।

वह उन तमाम अखबारों को खरीद डालता है, जिनमें उसके अकादमी होने की खबरें होती हैं। वह अपने नाम वाली लाइन को काटकर रखता है, ताकि भविष्य के शोधार्थी जब उस पर रिसर्च करें, तो उन्हें कष्ट न हो। सारी सूचना उसी के संग्रहालय में मिल जाए। वह अचानक ‘फ्यूचर फ्रेंडली’ हो उठता है। अगर कोई साक्षात्कार लेने नहीं आता, तो वह देने पहुंच जाता है। वह देर तक स्टेज पर रहता है, ताकि सब उसका फोटो ले लें। अकादमी होने के बाद वह ‘किसी को निराश नहीं करूंगा’ के रोल में आ जाता है। ‘झोलियां भर गईं सबकी कोई खाली न गया’ वाले ‘सांई संध्या गीत’ उसके कानों में गूंजने लगते हैं।

वह एक ही समय में तुष्ट, उदात्त, पुलकित, हुलसित, गदगद, धन्य-धन्य, अहो-अहो, अहा-अहा, महा-महा और थैंक्स-थैंक्यू-धन्यवादादि  से आप्लावित होता हुआ, परम कन्फ्यूजायमान हुआ अपनी नई-नई कमीज से अपना चश्मा साफ करता पाया जाता है। अकादमी होने के बहुत पहले से की गई मेहनत, पूजा-पैरवियां, जिस-तिस की चौखट पर निरंतर मत्था रगड़ना, आचार्यों की गर्द-गंभीर पादुकाओं को साफ-सुथरी रखने के लिए अवसर-अनवसर अपनी पगड़ी-रूमाल का सदुपयोग करने की चौबीस बाई सात वाली सजगता, उनकी उपेक्षा को अपनी उपलब्धि समझना, उनकी गाली को ताली समझना, उनकी ठोकर को अपनी अकादमी का लॉकर समझना, ‘प्रात:काल उठकर लेखकवा, फोन उठाय कइसन है सरवा!’ का लेखक कुलोचित आचरण आदि की नित्य-क्रियाएं याद आने लगती हैं।

अकादमी होने के बाद आदमी या तो उद्घाटन का आग्रह करता है या विमोचन के किस्से बताता है या फिर अध्यक्ष होने का गर्व दिखाता है। वह अपना ‘रिपीट परफारमर’ बन उठता है। वह कविता-कहानी रिपीट करने लगता है और  कविता-कहानी भी उसे रिपीट करने लगती है। फिर वह ऐसा ठूंठ हो उठता है, जिस पर नई कोंपलें नहीं उगतीं।
अंतत: वह एक महाबोर ‘आत्मकथा’ हो जाता है। वह ‘संस्मरण’ में रमण करने लगता है। वह नवांकुरों के लिए ‘भूमिका’ लिखने लगता है और दिवंगतों का ‘अतिथि संपादक’ हो जाता है। वह उस ‘खोए हुए आदमी’ की तरह होता है, जो हर बार उसी मुकाम पर लौट आता है, जिससे वह चला था। वह जब-तब ‘मंडी हाउस-मंडी हाउस’ बुदबुदाता है। ‘अकादमी-अकादमी’ चिल्लाता है और अक्सर अकादमी के गेट पर गाता हुआ पाया जाता है: ‘ये क्या हुआ? कैसे हुआ? कब हुआ? क्यूं हुआ? छोड़ो, ये न पूछो! हूं हूं हूं!! ये क्या हुआ..!!

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