जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी…

12 अगस्त 1942 को सदर तहसील में ब्रिटिस हुकुमत के यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहराने वाले औरैया के छह वीर सपूत शहीद हुए थे। करीब सौ वर्ष पुरानी तहसील को वर्तमान में नया रूप दिया जा रहा है।

Auraiya

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान पर 12 अगस्त 1942 को आधा दर्जन नौजवानों ने तहसील पर लगे गुलामी के प्रतीक यूनियन जैक को उतार कर तिरंगा फहराते हुए अंग्रेजों की गोलियां सीने पर खाकर शहादत दी थी। इस आंदोलन में कई लोगों के घायल होने के साथ सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए थे और पूरे शहर पर जुर्माना लगाया गया था। आजादी के निर्णायक संघर्ष में औरैया के वाशिंदों ने आगे बढ़कर हिस्सेदारी की। 9 अगस्त 1942 को बंबई में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने जब अंग्रेजों भारत छोड़ो और करो या मरो का नारा दिया। तो औरैया में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ ज्वाला भड़क उठी। रेलवे स्टेशन, पोस्ट आफिस सहित अन्य सरकारी इमारतों पर तोड़फोड़ की गई। टेलीफोन के तार काट दिए गए वहीं रेलवे पटरियां उखाड़ दी गई।

औरैया में कांग्रेसी छक्की लाल दुबे, बल्दू पहलवान और हाफिज करीम बख्स की तिकड़ी ने आंदोलन की कमान संभाली। आक्रोश में 10 अगस्त को बाजार बंद रहा। 11 अगस्त को तिलक महाविद्यालय के पास पुराना नुमाईश मैदान में एक बैठक बुलाई गई। इसमें छक्कीलाल, बल्दू पहलवान, करीम बख्स, शिवशंकर लाल, मंगली प्रसाद आर्य, कृष्ण बल्देव वर्मा, विजय शंकर गुप्ता, छन्नू लाल सक्सेना, वीरेंद्र सिंह कखावतू आदि कांग्रेसी जमा हुए। बैठक में तय हुआ कि तहसील पर लगे यूनियन जैक को उतारकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाए। बैठक की सूचना पाकर दरोगा रामस्वरुप व दीवान खट्टन वहां पहुंच गए और वरिष्ठ नेता छक्कीलाल दुबे से गाली गलौज करने लगे। छात्रोें व नौजवानों को उनका अपमान बर्दाश्त न हुआ और उन्होंने दरोगा व दीवान की जमकर पिटाई कर दी। 12 अगस्त की सुबह तिलक इंटर कालेज पर भारी संख्या में छात्र व नौजवान जमा हुए। वहां से एकजुट होकर पुरानी धर्मशाला पहुंचे। यहां से 10 बजे सैकड़ों लोगों का जुलूस अंग्रेजों भारत छोड़ो और महात्मा गांधी जिंदाबाद के नारे लगाता हुआ तहसील पहुंचा।

जुलूस पहुंचते ही थानेदार जगन्नाथ और सीओ रामजी लाल ने छात्रों को वहां से चले जाने की चेतावनी दी, लेकिन आंदोलित छात्र अपने मकसद को पूरा करने का मन बना चुके थे। इसी दौरान मंगली आर्य एक सीढ़ी ले आए और तहसील भवन पर लगा दी। छात्र तिरंगा लेकर तहसील पर फहराने को चढ़ने लगे। इस पर पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। जवाब में छात्रों ने भी पत्थरबाजी की तो पुलिस वाले भागकर थाने में जा घुसे। फाटक बंदकर उन्होंने खिड़की से गोलियां चलाईं। पहली गोली लाला कल्याण चंद्र को लगी। इसमें कल्याण चंद, बाबूराम, मंगली प्रसाद, भूरे लाल, दर्शनलाल, सुल्तान खां शहीद हो गये। दर्जनों क्रांतिकारी घायल हुए। इसके बावजूद भारत माता के वीर सपूतों ने तहसील भवन पर तिरंगा फहरा ही दिया।

गुलामी की याद दिलाती नील की कोठियां
मुरादगंज(औरैया)। आजादी को भले ही 65 वर्ष बीत गये हो, लेकिनइलाके के रोशंगपुर, लखनपुर, हैदरपुर, चपटा, कोठी, कस्बा जाना आदि गांवों में नील की कोठियों के अवशेष आज भी गुलामी की दासतां बयां करती हैं। रमेश चंद्र त्रिपाठी, दुर्गा प्रसाद दुबे, ज्ञानेंद्र सिंह भदौरिया आदि बुजुर्गों का कहना है कि 1757 में जब अंग्रेज भारत में व्यापार करने आये थे। तब उन्होंने नील का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे देशी रियासतों में उठे मतभेदों के चलते मौका पाते ही उनको अपने अधीन कर लिया। यहां की सोना उगलने वाली भूमि पर अंग्रेजों ने बूटों की ठोकरों के बल पर किसानों को नील की खेती करने को मजबूर किया। 1882 में निर्मित टकपुरा नहर कोठी की इमारत इस बात की गवाह है कि अंग्रेजी अधिकारी यहां रुककर हुकूमत चलाते थे। रोशंगपुर और लखनपुर के अवशेष भी यही याद दिलाते हैं।

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